असली आज़ादी: रानी लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई फुले के देश में जब आप महिलाओ की स्तिथि देखते है तो जी घबरा उठता है, हम आज भी अधूरी आज़ादी मना रहे है क्यूंकि हमारी स्त्रियाँ आज भी क़ैद है और शोषित है| भारत ने 1947 में अंग्रेज़ी हुकूमत की बेड़ियाँ तोड़ दीं, लेकिन क्या हमारे समाज ने सचमुच आज़ादी हासिल कर ली है? यह सवाल हमें तब झकझोरता है, जब महिलाओं के खिलाफ़ बढ़ते अपराधों के आंकड़े सामने आते हैं। आज़ादी का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और सुरक्षा भी है। अगर महिलाएँ ही अपने घर, सड़क, कार्यस्थल—हर जगह असुरक्षित महसूस कर रही हों, तो यह कैसी आज़ादी?
भारत का परिदृश्य: भयावह आँकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2022 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर में 12% से अधिक वृद्धि हुई। यानी हर 100,000 महिलाओं पर दर्ज मामलों की संख्या 58.8 से बढ़कर 66.4 हो गई।
सबसे ज़्यादा मामले हैं—
- पति/ससुराल द्वारा क्रूरता (31.4%)
- महिलाओं का अपहरण (19.2%)
- शर्म-लज्जा का अपमान (18.7%)
- बलात्कार (7.1%)
दिल्ली, हरियाणा, तेलंगाना और राजस्थान जैसे राज्यों में तो यह दर राष्ट्रीय औसत से कहीं ऊपर है।
हालाँकि, उत्तर प्रदेश ने एक उदाहरण पेश किया है—यहाँ फ़रवरी 2025 तक दर्ज 1.22 लाख मामलों में से 98.6% मामलों का निपटान कर दिया गया, जो देश में सर्वाधिक है। लेकिन सवाल यह भी है कि निपटान का अर्थ हमेशा न्याय नहीं होता। क्या हर पीड़िता को इंसाफ़ मिला?
दुनिया की तस्वीर: घर ही सबसे ख़तरनाक जगह
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं। WHO के अनुसार, दुनिया की हर तीसरी महिला ने कभी न कभी अपने जीवन में शारीरिक या यौन हिंसा झेली है।
- 2023 में, औसतन 140 महिलाएँ प्रतिदिन अपने साथी या किसी रिश्तेदार द्वारा मारी गईं।
- 2021 में, विश्व स्तर पर 81,000 महिलाओं की हत्या हुई, जिनमें से 60% अपने ही घरों में मारी गईं।
- UNICEF के मुताबिक, हर 8 में से 1 लड़की 18 साल से पहले यौन शोषण का शिकार होती है।
यह तथ्य बताता है कि दुनिया में औरतों के लिए सबसे असुरक्षित जगह उनका घर ही है। जहाँ सुरक्षा और स्नेह की उम्मीद होती है, वहीं हिंसा और अपमान की जड़ें सबसे गहरी हैं।
गंभीर विश्लेषण: अधूरी आज़ादी
जब आज़ादी की बात होती है, तो हमें यह समझना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा ही राष्ट्र की असली स्वतंत्रता का पैमाना है।
- अगर घरों में बेटियाँ और पत्नियाँ डर के साये में जी रही हों,
- अगर कार्यस्थलों पर छेड़छाड़ और भेदभाव आम हो,
- अगर अदालतों में न्याय के लिए सालों इंतज़ार करना पड़े—
तो यह कैसी आज़ादी?
हमारे संविधान ने समानता का अधिकार दिया, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में लिंग आधारित हिंसा आज भी सामाजिक ढांचे की गहरी दरार को उजागर करती है।
आखिर कहाँ गए वे सवाल? : मीडिया की एकरसता और लोकतंत्र का संकट
रास्ता क्या है?
- कानून का कठोर और समयबद्ध क्रियान्वयन – तेज़ और निष्पक्ष न्याय ज़रूरी है।
- सामाजिक सुधार – शिक्षा, परिवार और संस्कृति में स्त्री के प्रति सम्मान को स्थापित करना होगा।
- बचपन से सुरक्षा – बालिकाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान, क्योंकि हिंसा की जड़ अक्सर वहीं से शुरू होती है।
- वैश्विक सीख – यह केवल भारत का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि महिला सुरक्षा के बिना कोई भी समाज टिकाऊ प्रगति नहीं कर सकता।
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समापन: असली स्वाधीनता की परिभाषा
महात्मा गाँधी ने कहा था—“किसी राष्ट्र की प्रगति का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि वहाँ महिलाओं की स्थिति कैसी है।”
आज, जब हम ‘विश्वगुरु’ बनने की बात करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि राष्ट्र की इज़्ज़त उसकी महिलाओं की इज़्ज़त से जुड़ी है।
असली आज़ादी तब ही आएगी, जब हर लड़की बिना डर के स्कूल जा सके, हर महिला बिना भय के काम कर सके, और हर माँ, बहन, पत्नी अपने घर की चारदीवारी में सुरक्षित महसूस कर सके।
क्योंकि सच यही है—
“भारत तभी स्वतंत्र होगा, जब उसकी आधी आबादी भय से मुक्त होगी।”