कैंसर ट्रेन का प्रतीक
हर रात बठिंडा से बीकानेर तक जाने वाली वह ट्रेन, जिसे आम लोग “कैंसर ट्रेन” कहते हैं, सिर्फ़ मरीजों को लेकर नहीं चलती। यह ट्रेन हमारे कृषि मॉडल और भोजन की गिरती गुणवत्ता की दर्दनाक कहानी कहती है। आँकड़े भले ही बताते हों कि इसमें सफर करने वाले कैंसर मरीजों की संख्या कुल रोगियों की तुलना में सीमित है, लेकिन यह ट्रेन लोगों के मन में डर और पीड़ा का प्रतीक बन चुकी है।
भारत, जो कभी “अन्नदाता” कहलाने पर गर्व करता था, आज अपनी मिट्टी, पानी और भोजन में घुलते जहर से जूझ रहा है। सवाल है—क्या हम आने वाली पीढ़ी को सेहत देंगे या बीमारी?
पंजाब: हरित क्रांति की थक चुकी मिट्टी
कैंसर ट्रेन: पंजाब ने हरित क्रांति में देश को अन्न संकट से बाहर निकाला। लेकिन वही हरित क्रांति आज बोझ बन चुकी है।
- अत्यधिक रासायनिक खाद और कीटनाशक – पंजाब में प्रति हेक्टेयर रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है।
- जल संकट – भूजल का स्तर हर साल औसतन एक मीटर नीचे जा रहा है।
- फसल चक्र का संकट – गेहूं-धान के चक्र ने मिट्टी की सेहत छीन ली, जिससे ज़िंक, मैग्नीशियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व गायब हो गए।
केस स्टडी: मालवा क्षेत्र
मालवा बेल्ट (बठिंडा, मानसा, फरीदकोट) में कैंसर के मामले सबसे ज्यादा हैं। कई रिपोर्टों ने पानी में भारी धातुओं (जैसे यूरेनियम) और कीटनाशक अवशेषों की उपस्थिति को जिम्मेदार ठहराया है। यही इलाका “कैंसर ट्रेन” का सबसे बड़ा यात्री स्रोत है।
हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश: वही राह, वही खतरा
कैंसर ट्रेन: पंजाब की तरह हरियाणा और पश्चिमी यूपी ने भी रासायनिक खेती का अंधाधुंध मॉडल अपनाया।
- गन्ना और धान की अधिक खेती ने जल संकट गहराया।
- आलू और टमाटर जैसी सब्जियों में पेस्टीसाइड का स्तर WHO की गाइडलाइन से कहीं अधिक पाया गया।
- इन राज्यों में भी कैंसर और किडनी रोग बढ़ रहे हैं, लेकिन चर्चा पंजाब जितनी गहरी नहीं है।
महाराष्ट्र और विदर्भ: कीटनाशक और आत्महत्याएँ
विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान पानी की कमी और महंगे कीटनाशकों के बीच फंसे हैं।
- कपास की खेती में Bt कॉटन आने के बाद भी कीटनाशकों का इस्तेमाल घटा नहीं, बल्कि नए कीड़े (पिंक बॉलवर्म) के कारण और बढ़ा।
- 2017 में कीटनाशक जहरीले धुएं से विदर्भ में सैकड़ों किसान और मज़दूर बीमार पड़े।
- आत्महत्याओं के पीछे कर्ज़ तो कारण है ही, लेकिन जहरीली खेती ने किसानों की आर्थिक और शारीरिक हालत दोनों बिगाड़ी।
पश्चिम बंगाल और चावल की समस्या
पश्चिम बंगाल भारत का सबसे बड़ा धान उत्पादक राज्य है।
- यहाँ भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन आर्सेनिक प्रदूषण की बड़ी समस्या बन चुका है।
- नदियों और तालाबों में कीटनाशक बहकर मछलियों और सब्जियों तक पहुँचते हैं।
- नतीजतन, कोलकाता और ग्रामीण बंगाल में पेट और लीवर की बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य: यह समस्या सिर्फ भारत की नहीं
- चीन – भारी औद्योगिकीकरण और कीटनाशक प्रयोग से चीन की मिट्टी के एक बड़े हिस्से को “प्रदूषित” घोषित किया गया है। वहाँ “ग्रीन फूड” और “ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन” पर भारी निवेश हो रहा है।
- यूरोप – 1970–80 के दशक में यूरोप में भी कीटनाशक संकट गहराया था। आज वहाँ जैविक खेती और फार्म-टू-टेबल मॉडल को प्रोत्साहन मिल रहा है।
- अफ्रीका – कीटनाशकों की अनियंत्रित बिक्री ने नाइजीरिया और केन्या में स्वास्थ्य संकट पैदा किया है।
इन उदाहरणों से सीख यह है कि कृषि नीति बदलना कठिन है, लेकिन देर की गई तो स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों की कीमत चुकानी पड़ती है।
हमारी थाली का सच: पोषण बनाम ज़हर
- भारत में 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 30% से अधिक सब्जियाँ और फल सुरक्षित अवशेष सीमा से अधिक कीटनाशक लिए हुए पाए गए।
- मंडियों और सुपरमार्केट तक पहुंचने से पहले ही अनाज का बड़ा हिस्सा खराब भंडारण, फफूंद और नमी से बिगड़ जाता है।
- WHO की रिपोर्ट बताती है कि हर साल भारत में लाखों लोग भोजन जनित रोगों से पीड़ित होते हैं।
यानी किसान मेहनत करके जो भोजन उगाता है, वह खुद उपभोक्ता और किसान परिवार दोनों की सेहत को खतरे में डालता है।
आयुर्वेद और स्वास्थ
नीतिगत समाधान: किसान और सरकार दोनों की जिम्मेदारी
- फसल विविधता का प्रोत्साहन
- गेहूं-धान के बजाय बाजरा, ज्वार, दालें और तिलहन को बढ़ावा मिले।
- सरकार MSP का दायरा बढ़ाए।
- जैविक खेती और प्राकृतिक उपाय
- किसानों को जैविक खाद, गोबर और नीम आधारित कीटनाशकों की ओर ले जाने के लिए सब्सिडी।
- जैविक क्लस्टर मॉडल, जहाँ पूरे गाँव एक साथ परिवर्तन करें।
- जल प्रबंधन
- ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को अनिवार्य करना।
- भूजल रिचार्ज के लिए वर्षा जल संचयन।
- मिट्टी की सेहत कार्ड और परीक्षण
- हर खेत का हर दो साल में परीक्षण अनिवार्य।
- पोषक तत्वों की कमी की भरपाई के लिए वैज्ञानिक गाइडलाइन।
- भंडारण और सप्लाई चेन
- आधुनिक गोदाम और कोल्ड स्टोरेज पर निवेश।
- मंडी से उपभोक्ता तक फसल का ट्रेसिंग सिस्टम।
- स्वास्थ्य और शिक्षा
- गांवों में कैंसर और अन्य बीमारियों की नियमित स्क्रीनिंग।
- किसानों और उपभोक्ताओं को खाद्य सुरक्षा पर जागरूक करना।
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असली आज़ादी भोजन की आज़ादी
भारत ने आज़ादी पाई थी भूख और गरीबी को मिटाने के लिए। हरित क्रांति ने हमें अनाज तो दिया, लेकिन अब वह हमारी मिट्टी और सेहत पर भारी पड़ रही है।
कैंसर ट्रेन केवल पंजाब की कहानी नहीं है। यह भारत की चेतावनी है। अगर हमने खेती को रसायनों के जाल से मुक्त न किया, तो यह ट्रेन कल बिहार, यूपी और बंगाल से भी चल सकती है।
असली स्वतंत्रता तभी होगी जब हमारी थालियों में रखा भोजन पौष्टिक और सुरक्षित होगा, जब किसान कर्ज़ और कीटनाशकों के बोझ से आज़ाद होगा, और जब हमारी मिट्टी फिर से जीवनदायिनी बनेगी।